नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम को उस बड़ी निर्णय लेने की प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता, जिसके कारण छात्र प्रदर्शनकारी आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था।इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली रूपम की याचिका पर सुनवाई करते हुए, न्यायमूर्ति एससी शर्मा और एनके सिंह की पीठ ने कहा कि यदि निर्णय लेने की श्रृंखला “ऊपर से नीचे” तक चलती है, तो जिला मजिस्ट्रेट को अलग नहीं किया जा सकता है।शीर्ष अदालत ने कहा, “हम उसे अलग-थलग नहीं कर सकते… 5 लाख रुपये का जुर्माना।”उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि डीएम ने उन रिपोर्टों पर कार्रवाई की थी जो उन तक पहुंचने से पहले SHO, डीसीपी और कमिश्नर से होकर गुजरी थीं। उन्होंने यह भी बताया कि एनएसए सलाहकार बोर्ड ने हिरासत की जांच की थी।रूपम की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि डीएम द्वारा हिरासत आदेश जारी करने से पहले पांच चरण थे और उनकी भूमिका वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन करने के बाद एक राय बनाने की थी।
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यह सुनवाई इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा 25 वर्षीय छात्रा आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत को रद्द करने के कुछ दिनों बाद हुई है, जिसे अप्रैल में नोएडा में श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था।उच्च न्यायालय ने पाया कि हिरासत राज्य द्वारा “मनगढ़ंत” कहानी पर आधारित थी और चौधरी की तत्काल रिहाई का निर्देश दिया, यदि किसी अन्य मामले में उनकी आवश्यकता नहीं थी।इसने यह भी निर्देश दिया कि मुआवजे के रूप में 5 लाख रुपये रूपम के वेतन से काटे जाएं और आदेश दिया कि डोजियर तैयार करने में शामिल डीएम और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अदालत की नाराजगी उनके सेवा रिकॉर्ड में दर्ज की जाए।इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी रूपम को चेतावनी दी थी कि “गलत” नौकरशाही द्वारा “निरंकुश” आचरण जारी रखने से उत्तर प्रदेश ऑरवेलियन डिस्टोपिया में बदल सकता है।


